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बलि

  बलि अमित कुमार विश्वास मुख्‍यमंत्री काफी झल्‍लाये-झल्‍लाये से रहते हैं। भला उनकी बेटी मने एक मुख्‍यमंत्री की बेटी भाग जाए, किसी ऐरे-गैरे छौड़े के साथ तो फिर दूसरों को क्‍या मुँह दिखाएँगे? उन्‍हें ललिया पर इतना गुस्‍सा आता है कि अगर मिल जाए तो क्‍या न कर डालें! परेशान करने के लिए क्‍या इतना ही कम था कि उन पर विरोधी पक्ष ने आय से ज्‍यादा संपत्ति रखने की अफवाह उड़ा दी और सीबीआई वालों का छापा भी पड़ गया। अब एक चीफ मिनिस्‍टर अपनी कुर्सी पर नहीं, जेल की सलाखों के पीछे है। यह सब सिंबोंगा के नाराज होने का ही परिणाम हैं। पत्‍नी ने बलि देने की मनौती माँगी है। एक तरफ जॉन गुरू, दूसरी तरफ मंदिर के पुजारी... दोनों की राय एक है कि बलि के बाद ही इस अभिशाप से मुक्ति मिल पाएगी। क्‍या-क्‍या नहीं सुनना पड़ता है जो पंडित जी देखते दंडवत में बिछ जाया करते वे ही अब ताने कसते हैं। परसों मिलने को आए तो बिना किसी संदर्भ के जहर उगलने लगे कि अरे राज काज तो बराह्मण, राजपूतों का काम है। अब आपके जैसे लोग भी राजकाज करने लगेंगे तो देवता कुपित नहीं होंगे। चारों वर्णों को अपने-अपने वर्ण के अनुसार काम करना चाहिए। मन...