बलि
बलि
अमित कुमार विश्वास
मुख्यमंत्री काफी झल्लाये-झल्लाये से रहते हैं। भला उनकी बेटी मने एक मुख्यमंत्री की बेटी भाग जाए, किसी ऐरे-गैरे छौड़े के साथ तो फिर दूसरों को क्या मुँह दिखाएँगे? उन्हें ललिया पर इतना गुस्सा आता है कि अगर मिल जाए तो क्या न कर डालें! परेशान करने के लिए क्या इतना ही कम था कि उन पर विरोधी पक्ष ने आय से ज्यादा संपत्ति रखने की अफवाह उड़ा दी और सीबीआई वालों का छापा भी पड़ गया। अब एक चीफ मिनिस्टर अपनी कुर्सी पर नहीं, जेल की सलाखों के पीछे है। यह सब सिंबोंगा के नाराज होने का ही परिणाम हैं। पत्नी ने बलि देने की मनौती माँगी है। एक तरफ जॉन गुरू, दूसरी तरफ मंदिर के पुजारी... दोनों की राय एक है कि बलि के बाद ही इस अभिशाप से मुक्ति मिल पाएगी। क्या-क्या नहीं सुनना पड़ता है जो पंडित जी देखते दंडवत में बिछ जाया करते वे ही अब ताने कसते हैं। परसों मिलने को आए तो बिना किसी संदर्भ के जहर उगलने लगे कि अरे राज काज तो बराह्मण, राजपूतों का काम है। अब आपके जैसे लोग भी राजकाज करने लगेंगे तो देवता कुपित नहीं होंगे। चारों वर्णों को अपने-अपने वर्ण के अनुसार काम करना चाहिए। मने कि बराह्मण गुरू होकर राजपूत राज करेगा बनिया व्यापार और शूद्र सेवा। और ज-है-से ही आप तो चारों वर्णों से भी बाहर ही हुए। बुरा मत मानिएगा जजमान। गलत कहें तो शूली पे चढ़वा दीजिएगा। जब यह सब वर्णाश्रम धर्म के विरूद्ध जाने का ही कुफल है। फिर वे जॉन गुरू की ओर मुड़े, 'बोलिए हम गलत कह रहे हैं?' जॉन गुरू बोले - 'अरे नहीं महाराज। आप कैसे गलत बोल सकते हैं। समाज के सिरमौर हैं आप। गलती निश्चित हुई है। नहीं तो बेटी का वो हाल होता? और सीबीआई का ये मजाल कि... खैर, बलि संपन्न हो जाए तो ये संकट के बादल अपने आप छंट जाएँगें।'
''लेकिन बलि के लिए बकरे कहाँ से आएँगें। महाराज हम तो यहाँ पड़े हुए हैं।'' - मुख्यमंत्री ने कहा।
''अरे मरा हाथी भी सवा लाख का होता है।''- पंडित जी ने कहा, ''आपकी रानी साहिबा, माने कि ललिया की माई चाहे तो सारे बकरे को लाकर हाजिर कर देंवे। यह पुण्य कार्य जितनी जल्दी हो उतना ही भला है।''
वे चले गए, मुख्यमंत्री पिंजरें में बंद भेड़िये की तरह चहल-कदमी करते रहे। तभी रानी साहिबा आती दिखीं। उनके चेहरे पर आनंद और अपमान के मिले-जुले भाव थे, ''कुछ खबर है, ललिया को बेटा हुआ है।''
''तो नाचो न साड़ी खोलकर'', चीफ मिनिस्टर भड़कते हुए कहा कि ''उस सत्यनाशिनी का नाम भी मत लो, वो मेरे लिए मर चुकी है। नाक कटा कर रख दिया है।'' रानी साहिबा सिटपिटा गई, कुछ बोलते न बनी। वे बकर-बकर पति का मुँह देखती रही। जो क्रोध और चिंता में मनहूस-सा लग रहा था, ''सुनो, कम से कम एक हजार बकरे की बलि देनी होगी।''
''एक हजार...?''
''हाँ, कम से कम एक हजार। पंडित जी और जॉन गुरू दोनों का विचार है कि एकमात्र यही रास्ता है जिससे इस अभिशाप से मुक्ति मिल पाएगी। एक बार छूट कर आने दो फिर हम सबको देख लेंगे कि कौन-कौन हमारे पीछे लगा हुआ था, ललिया और अपने दामाद कमलेश्वरी को भी पाताल से खोज निकालेंगे और सरे आम सूली पर चढ़ाएँगे।''
रानी ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला लेकिन बोल न पाई।
इधर मुख्यमंत्री के एक पट्ठे ने हामिद मियाँ को हुक्म दिया - ''हमीद मियाँ... कम से कम एक हजार बकरे चाहिए पूजा के लिए।''
''लेकिन हुजूर एक हजार तो बहुत ज्यादा है वो भी बकरा ही सिर्फ। कहाँ से लाएँगें...?''
''अभी चार दिन बाकी है पूर्ण चाँद होने में। एक सिरे से कसते जाओ, चाहे बकरा हो या बकरी। हमें किसी भी हालत में हजार चाहिए।'' हमीद मियाँ हुक्म का पालन करने को निकल पड़े।
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